Newzfatafatlogo

चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति: भारत को घेरने की रणनीति

चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति भारत को घेरने की एक रणनीति है, जिसमें पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव जैसे देशों के पोर्ट और द्वीप शामिल हैं। यह नीति बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य हिन्द महासागर में सामरिक ठिकाने स्थापित करना है। जानें इस नीति का इतिहास और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 | 

स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स क्या है?

माला एक अलंकारिक वस्तु होती है, जो फूलों, पत्तियों, कागज आदि से बनाई जाती है। मालाएं कई प्रकार की होती हैं, जैसे फूलों की, रत्नों की, बीजों की और धातुओं की। विशेष रूप से मोतियों की माला एक पौधे से संबंधित है, जिसे अंग्रेजी में स्ट्रिंग ऑफ प्लर्स कहा जाता है। यह पौधा गोलाकार, छोटे मटर के आकार के पत्तों से पहचाना जाता है, जो सुंदरता से प्लांटर्स और हैंगिंग बास्केट में फैलते हैं। लेकिन आज हम इस पौधे के बजाय चीन की एक नीति, जिसे स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स कहा जाता है, पर चर्चा करेंगे। यह नीति भारत को घेरने के लिए चीन द्वारा अपनाई गई है।


चीन दक्षिणी छोर पर हिन्द महासागर के माध्यम से भारत को घेरने की योजना बना रहा है। इसके लिए वह पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और मालदीव जैसे देशों का सहारा ले रहा है। ग्वादर पोर्ट, हंबनटोटा, चिटगोंग पोर्ट, क्यौकप्यू पोर्ट और फेयधूफिनोल्हु द्वीप जैसे स्थानों को चीन ने अपने आधार के रूप में स्थापित किया है। यह नीति चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का हिस्सा है, जो कंबोडिया से शुरू होकर विभिन्न देशों से होते हुए सुडान तक जाती है।


इस नीति के तहत, चीन इन देशों के पोर्ट और द्वीपों पर अपने सैन्य ठिकाने बना रहा है।


चीन की योजना का खुलासा

स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स का उल्लेख लगभग 16 साल पहले, 2005 में, अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की एक खुफिया रिपोर्ट में किया गया था। इस रिपोर्ट में चीन द्वारा समुद्र में बनाए जा रहे सामरिक ठिकानों का विस्तृत विवरण दिया गया था। ये ठिकाने दक्षिण चीन सागर से लेकर मलक्का-स्ट्रैट, बंगाल की खाड़ी और अरब की खाड़ी तक फैले हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन इन ठिकानों का उपयोग अपने ऊर्जा स्रोतों की सुरक्षा के लिए कर रहा है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर इन्हें सैन्य उद्देश्यों के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है।


मालदीव और म्यांमार में चीन की उपस्थिति

मालदीव में चीन की गतिविधियों पर भरोसा करना कठिन हो जाता है, क्योंकि यह योजना जिबूती तक सीमित नहीं है। मालदीव में चीन ने फेयधूफिनोल्हु द्वीप पर एक सैन्य बेस स्थापित किया है, जिसे 2066 तक 4 मिलियन डॉलर की लीज पर लिया गया है। इस द्वीप का आकार 38 हजार स्क्वायर मीटर से बढ़कर एक लाख स्क्वायर मीटर हो गया है। यदि यह बेस पूरी तरह से कार्यशील हो जाता है, तो यह भारत के लक्षद्वीप से केवल 900 किलोमीटर और मुख्य भूमि से 1000 किलोमीटर की दूरी पर होगा।


म्यांमार के क्याकप्यू बंदरगाह पर भी चीन की उपस्थिति है, जो संघर्ष के समय एक सैन्य सुविधा के रूप में कार्य कर सकता है। यहां चीन ने काफी निवेश किया है और क्यायुकु और कुनमिंग को जोड़ने वाली 2400 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन इसका एक उदाहरण है।