ट्रंप का सऊदी अरब के लिए सख्त न्यूक्लियर समझौता प्रस्ताव
सऊदी अरब के साथ न्यूक्लियर समझौते पर ट्रंप का रुख
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय सिविल न्यूक्लियर समझौते पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक कठोर दृष्टिकोण अपनाया है। शुक्रवार को, ट्रंप ने स्पष्ट किया कि सऊदी अरब को अमेरिका के साथ परमाणु ऊर्जा साझेदारी को अंतिम रूप देने के लिए 'अब्राहम समझौते' में शामिल होना आवश्यक है।
उन्होंने यह भी कहा कि रियाद अब ईरान जैसी क्षेत्रीय ताकत के खतरे से मुक्त है, जिसके कारण पहले वे पीछे हट रहे थे।
अब्राहम समझौते का महत्व
ट्रंप ने अमेरिकी न्यूक्लियर इनोवेशन पर अपने संबोधन में कहा कि इजरायल के साथ सामान्यीकरण समझौते में शामिल होना मध्य पूर्व के शांतिपूर्ण भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अब्राहम समझौते 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुए राजनयिक समझौतों की एक श्रृंखला हैं, जिन्होंने इज़राइल और कई अरब देशों के बीच औपचारिक संबंध स्थापित किए।
ट्रंप की शर्तें
ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब को अब्राहम समझौते का सदस्य बनना होगा। उन्होंने यह भी बताया कि पहले देशों को ईरान से समस्या थी, लेकिन अब ऐसा कोई खतरा नहीं है।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि प्रस्तावित ऊर्जा ढांचा केवल गैर-सैन्य न्यूक्लियर कार्यों तक सीमित रहेगा और इसमें घरेलू यूरेनियम संवर्धन शामिल नहीं होगा।
सऊदी अरब की स्थिति
रियाद ने बार-बार कहा है कि इजरायल को औपचारिक कूटनीतिक मान्यता देना एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य की दिशा में स्पष्ट रोडमैप पर निर्भर करता है।
वाशिंगटन और रियाद के बीच द्विपक्षीय सिविल न्यूक्लियर फ्रेमवर्क पर बातचीत कई अमेरिकी प्रशासनों के दौरान चलती रही है, लेकिन परमाणु प्रसार रोकने की शर्तों को लेकर पिछली कोशिशें सफल नहीं हो पाईं।
नए ड्राफ्ट की विशेषताएँ
हाल के ड्राफ्ट में सऊदी अरब को इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के 'एडिशनल प्रोटोकॉल' पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य नहीं किया गया है, जो बिना घोषित साइटों पर निरीक्षकों को जाने की अनुमति देता है।
