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नारियल पानी से बनी बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग: पर्यावरण के लिए एक नई उम्मीद

इंडोनेशिया के वैज्ञानिकों ने एक नई बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग फिल्म विकसित की है, जो नारियल पानी से बनाई गई है। यह फिल्म न केवल खाद्य सामग्री को सुरक्षित रखती है, बल्कि 25 दिनों में मिट्टी में घुल जाती है, जिससे पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस शोध में माइक्रोक्रिस्टलाइन सेल्यूलोज का उपयोग किया गया है, जो इसकी मजबूती को बढ़ाता है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि इस तकनीक में और सुधार की आवश्यकता है। जानें इस नई खोज के बारे में और कैसे यह प्लास्टिक के विकल्प के रूप में उभर रही है।
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खाद्य पैकेजिंग में बायोडिग्रेडेबल विकल्प

नई दिल्ली: वर्तमान में, खाद्य सामग्री को लंबे समय तक ताजा और सुरक्षित रखने में फूड पैकेजिंग की महत्वपूर्ण भूमिका है। दूध, फल, सब्जियां, स्नैक्स और तैयार भोजन सभी को ऐसी पैकेजिंग की आवश्यकता होती है, जो हवा और नमी से बचाकर उनकी गुणवत्ता बनाए रख सके। हालांकि, प्लास्टिक का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण के लिए एक गंभीर समस्या बन चुका है, क्योंकि यह मिट्टी और पानी में वर्षों तक बना रहता है। इस समस्या के समाधान के लिए, वैज्ञानिक ऐसे विकल्पों की खोज कर रहे हैं जो खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ पर्यावरण को भी नुकसान न पहुंचाएं।


इंडोनेशिया का नया शोध

इंडोनेशिया के हसनुद्दीन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एंडी दिरपान और उनकी टीम ने एक नई बायोडिग्रेडेबल फूड पैकेजिंग फिल्म विकसित की है। यह फिल्म पौधों से बने प्लास्टिक पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) पर आधारित है। इसमें मजबूती बढ़ाने के लिए माइक्रोक्रिस्टलाइन सेल्यूलोज (एमसीसी) और ऑक्सीजन को नियंत्रित करने के लिए ब्यूटाइलेटेड हाइड्रॉक्सीटोल्यून (बीएचटी) का उपयोग किया गया है। इस शोध को 5 मई 2026 को ऑनलाइन प्रकाशित किया गया और मार्च 2027 में आसियान जर्नल फॉर साइंस एंड इंजीनियरिंग इन मैटेरियल्स के वॉल्यूम 6 में प्रकाशित किया जाएगा।


पीएलए की विशेषताएं और चुनौतियां

पीएलए को पर्यावरण-अनुकूल प्लास्टिक माना जाता है क्योंकि यह प्राकृतिक स्रोतों से बनता है और समय के साथ नष्ट हो जाता है। लेकिन इसकी एक बड़ी कमी यह है कि यह सामान्य प्लास्टिक की तुलना में कम मजबूत होता है और ऑक्सीजन को भी उतनी अच्छी तरह नहीं रोकता। ऑक्सीजन के संपर्क में आने से खाद्य सामग्री जल्दी खराब हो जाती है। इसलिए वैज्ञानिक ऐसे तरीकों की खोज कर रहे थे जिससे पीएलए की मजबूती बढ़ाई जा सके और ऑक्सीजन को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जा सके।


नारियल पानी से बनी सेल्यूलोज

इस शोध का एक दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें प्रयुक्त सेल्यूलोज को पारंपरिक फसलों के बजाय, किण्वित नारियल पानी से तैयार किया गया है। इस प्रक्रिया में बैक्टीरिया शुद्ध और रेशेदार सेल्यूलोज का निर्माण करते हैं। वैज्ञानिकों ने इस सेल्यूलोज को परिष्कृत करके 'माइक्रोक्रिस्टलाइन सेल्यूलोज' (एमसीसी) पाउडर में बदला और फिर इसे पीएलए फिल्म में मिलाया। इस फिल्म को तीन बारीक परतों में तैयार किया गया, जबकि बीएचटी को केवल भीतर की दो परतों में रखा गया ताकि वह सीधे भोजन के संपर्क में रहकर ऑक्सीजन के प्रभाव को नियंत्रित कर सके।


परीक्षण और परिणाम

शोधकर्ताओं ने विभिन्न मात्रा में एमसीसी मिलाकर कई प्रकार की फिल्मों का परीक्षण किया। परिणामों से स्पष्ट हुआ कि जैसे-जैसे एमसीसी की मात्रा बढ़ाई गई, फिल्म की मजबूती में वृद्धि हुई और ऑक्सीजन का रिसाव भी कम हुआ। माइक्रोस्कोपिक जांच में नारियल पानी से बने एमसीसी वाली फिल्म की संरचना अत्यधिक सुगठित और त्रुटिहीन पाई गई। वैज्ञानिकों का मानना है कि बैक्टीरिया द्वारा तैयार सेल्यूलोज की उच्च गुणवत्ता ने इसे सामान्य एमसीसी की तुलना में बेहतर परिणाम दिया।


पर्यावरणीय प्रभाव

पर्यावरण के दृष्टिकोण से, इस नई पैकेजिंग ने सकारात्मक परिणाम दिए। जब इस फिल्म को मिट्टी में दबाकर परीक्षण किया गया, तो 25 दिनों में इसका लगभग 28.86 प्रतिशत हिस्सा प्राकृतिक रूप से टूट गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह दर अन्य बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के बराबर या उससे बेहतर है।


भविष्य की चुनौतियाँ

हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि इस तकनीक पर और काम करने की आवश्यकता है। फिल्म मजबूत और ऑक्सीजन रोकने में प्रभावी बनी, लेकिन यह अधिक लचीली नहीं थी। पैकेजिंग सामग्री को न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करनी होती है, बल्कि इसे परिवहन और रोजमर्रा के उपयोग के दौरान टूटने से भी बचाना होता है। इसलिए भविष्य में वैज्ञानिकों का लक्ष्य ऐसी फिल्म तैयार करना होगा जो मजबूती और लचीलेपन दोनों का सही संतुलन बनाए रखे।