नेपाल और बांग्लादेश में चीन की बढ़ती रणनीतिक उपस्थिति
नेपाल में चीन की बढ़ती भूमिका
अक्टूबर 2019 में, 27 तारीख को दीवाली के अवसर पर, नेपाल की राजधानी काठमांडू में त्योहार का माहौल लगभग एक पखवाड़े पहले से ही बनना शुरू हो गया था। शहर में रंग-रोगन और गड्ढों की भराई का काम चल रहा था, जिससे सब कुछ एकदम चमकदार और आकर्षक दिखने लगा। यह सब तैयारी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगमन के लिए की जा रही थी। इससे पहले, 1996 में जियांग जेमिन नेपाल आए थे, और दोनों राष्ट्रपतियों के बीच 23 वर्षों का अंतर था। नेपाल और भारत के बीच बढ़ती दूरी के कारण यह बदलाव आया है, जिससे नेपाल की नज़रे अब उत्तर की ओर, यानी चीन की तरफ बढ़ रही हैं।
चीन का ट्रांस-हिमालयन कनेक्टिविटी नेटवर्क
चीन ने तिब्बत के रेलवे नेटवर्क को काठमांडू तक बढ़ाने की योजना बनाई है, जो तकनीकी और पर्यावरणीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण है। हालांकि, यह परियोजना बीजिंग के भू-राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करती है। नेपाल को उत्तर से सप्लाई का वैकल्पिक मार्ग प्रदान करना और भारत के ट्रांज़िट एकाधिकार को कम करना इसका मुख्य उद्देश्य है।
एयरपोर्ट परियोजनाएं और वित्तीय चुनौतियाँ
चीन के एक्सपोर्ट-इंपोर्ट बैंक से प्राप्त 216 मिलियन डॉलर के रियायती ऋण से बने पोखरा एयरपोर्ट की व्यावसायिक व्यवहार्यता पर सवाल उठ रहे हैं। भारत ने ऐसे प्रोजेक्ट्स को समर्थन देने से इनकार कर दिया है, जिससे काठमांडू पर कर्ज़ का बोझ बढ़ रहा है।
बांग्लादेश में चीन की रणनीति
बांग्लादेश की भौगोलिक स्थिति इसे एक महत्वपूर्ण स्थान बनाती है। चीन ने बांग्लादेश में कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में निवेश किया है, जैसे पद्मा ब्रिज रेल लिंक। यह परियोजना दक्षिण-पश्चिम बांग्लादेश में कनेक्टिविटी को बेहतर बनाती है और चीन की तकनीकी क्षमता को दर्शाती है।
भारत के रणनीतिक उपाय
भारत ने क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने के लिए रेलवे लिंक और आंतरिक जलमार्गों में निवेश करने की योजना बनाई है। इसके अलावा, भारत ने चीन के निवेश को सीमित करने के लिए नीतियाँ लागू की हैं, जिससे नेपाल के हाइड्रोपावर क्षेत्र पर प्रभाव पड़ रहा है।
