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नेपाल के प्रधानमंत्री ने हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र की स्थापना का प्रस्ताव रखा

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पेश किया है, जिसमें उन्होंने नेपाल, भारत और चीन के सहयोग से 'हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र' की स्थापना की बात की। यह तंत्र क्षेत्र में बढ़ते तापमान और हाल की विनाशकारी बाढ़ के मद्देनजर आवश्यक है। शाह ने इस तंत्र के माध्यम से उपग्रह डेटा साझा करने और आपदाओं के समय सीमाओं के पार राहत कार्यों के समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका यह प्रस्ताव हिमालय क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा और लोगों की आजीविका के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।
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संयुक्त राष्ट्र महासभा में नेपाल का प्रस्ताव

(योषिता सिंह) संयुक्त राष्ट्र, 25 सितंबर - नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ के संदर्भ में नेपाल, भारत और चीन के सहयोग से 'हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र' की स्थापना का सुझाव दिया है। उन्होंने बृहस्पतिवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में अपने पहले भाषण में कहा कि बढ़ते तापमान से नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहा है। शाह ने बताया, "हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में लगभग दो अरब लोग निवास करते हैं।"


ये पर्वत नेपाल के साथ-साथ अन्य क्षेत्रों के लोगों को जल, पारिस्थितिकी तंत्र, कृषि और आजीविका प्रदान करते हैं। हिमालय केवल पृथ्वी का एक हाशिए का क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की जीवन-समर्थन प्रणाली का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने आगे कहा, "इसलिए, पहले कदम के रूप में, हम नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में एक हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र स्थापित करने का प्रस्ताव रखते हैं।"


शाह ने सुझाव दिया कि इस तंत्र के माध्यम से उपग्रह डेटा और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "आइए हम खतरनाक हिमनदीय झीलों की निगरानी करें।"


संयुक्त प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना और आपदा के समय सीमाओं के पार राहत एवं सहायता का समन्वय करना आवश्यक है। हिमालय को बिखरी हुई सूचनाओं का क्षेत्र बनाने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक प्रयोगशाला बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि पिघलता हुआ पर्माफ्रॉस्ट पर्वतीय ढलानों को कमजोर कर रहा है, जिससे हिमस्खलन, बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। इसके परिणामस्वरूप नेपाल-चीन सीमा के दोनों ओर भारी नुकसान हुआ है और बाढ़ का पानी भारत की ओर भी बह रहा है।