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नेपाल में बाढ़ के कारणों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन

नेपाल ने हाल ही में तिब्बत-नेपाल क्षेत्र में आई बाढ़ के कारणों की जांच के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति को दो महीने में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी है। इसमें जलविज्ञान, भूविज्ञान और आपदा प्रबंधन के विशेषज्ञ शामिल हैं। समिति बाढ़ के संभावित स्रोतों और इसके वैज्ञानिक कारणों का अध्ययन करेगी, साथ ही भविष्य में ऐसी आपदाओं से निपटने के उपायों की सिफारिश भी करेगी। जानें इस अध्ययन की तीन चरणों में योजना और जलवायु परिवर्तन से इसके संबंध के बारे में।
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नेपाल में बाढ़ की जांच के लिए समिति का गठन

नेपाल ने तिब्बत-नेपाल क्षेत्र में आई बाढ़ के कारणों और घटनाओं का विश्लेषण करने के लिए एक सात सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए दो महीने का समय दिया गया है। नेपाल के ऊर्जा, जल संसाधन और सिंचाई मंत्रालय ने बुधवार को जल नीति और गवर्नेंस के विशेषज्ञ देवेश बेलबेस की अध्यक्षता में इस समिति का गठन किया। समिति में हाइड्रोलॉजिस्ट नरेंद्र मान शाक्य, ग्लेशियोलॉजिस्ट रिजन भक्त कायस्थ, रिमोट-सेंसिंग विशेषज्ञ उत्तम बाबू श्रेष्ठ, जियोलॉजिस्ट मेघराज धिताल, हाइड्रोपावर इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञ हरि पंडित और आपदा-जोखिम कम करने वाले विशेषज्ञ अनिल पोखरेल शामिल हैं। मंत्रालय के प्रवक्ता मोहन कुमार शाक्य ने बताया कि "यह समिति बाढ़ के संभावित स्रोतों से लेकर भोटेकोशी/ल्हेन्डे नदी प्रणाली और निचले क्षेत्रों तक फील्ड स्टडी करेगी।"


इस जांच में न केवल बाढ़ के वैज्ञानिक कारणों और घटनाओं के क्रम का अध्ययन किया जाएगा, बल्कि यह भी पता लगाया जाएगा कि भविष्य में ऐसी आपदाओं से पनबिजली और ऊर्जा से जुड़े अन्य बुनियादी ढांचे को कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है। अधिकारियों के अनुसार, अध्ययन के दौरान आवश्यकतानुसार ड्रोन, सैटेलाइट इमेज और अन्य तकनीकों का उपयोग किया जाएगा। शाक्य ने कहा, "यह समिति इस घटना को केवल अत्यधिक वर्षा या बाढ़ के रूप में नहीं देखेगी, बल्कि इसे एक 'कैस्केडिंग डिज़ास्टर' के रूप में समझेगी, जिसमें हिमालयी, भू-वैज्ञानिक और जल-विज्ञान से जुड़े खतरे एक के बाद एक सक्रिय हो सकते हैं।"


जलवायु परिवर्तन और बाढ़ का संबंध

हिमालयी क्षेत्र में आपदा के कुछ दिनों बाद, सेंटर फॉर हाइड्रोलॉजी एंड वॉटर रिसोर्सेज रिसर्च द्वारा की गई एक प्रारंभिक स्टडी में कहा गया है कि बाढ़ के स्रोत और इसके आरंभिक कारणों का पता लगाने के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। सेंटर ने सुझाव दिया कि आपदा को जलवायु परिवर्तन से जोड़ने से पहले पूरी घटनाक्रम की गहन वैज्ञानिक जांच की जानी चाहिए। ऊर्जा बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान से सबक लेते हुए, समिति आपदा के दौरान बिजली उत्पादन और सिस्टम के संचालन को बनाए रखने के उपायों की सिफारिश करेगी।


अध्ययन की तीन चरणों में योजना

अधिकारियों के अनुसार, मंत्रालय ने इस अध्ययन को तीन चरणों में करने की योजना बनाई है। समिति पहले चरण में ऊँचे हिमालयी क्षेत्र से लेकर भोटेकोशी/ल्हेन्डे नदी प्रणाली और निचले क्षेत्रों तक की घटनाओं के क्रम और भौतिक नुकसान की जांच करेगी। इसके साथ ही, समिति ग्लेशियर, चट्टान और मिट्टी-ढलान की अस्थिरता, भूस्खलन, मलबे, नदी के बहाव और बाढ़ के बीच आपसी संबंधों का भी अध्ययन करेगी। दूसरे चरण में, समिति बाढ़ के तत्काल और मूल भौतिक कारणों की पहचान करेगी। संभावित स्रोत वाले क्षेत्रों में, विशेषज्ञों की टीम चट्टानों की स्थिति, दरारों, कमजोर भूवैज्ञानिक संरचनाओं, ढलान की स्थिरता, भूस्खलन की संभावना और नदी में आए तलछट की मात्रा और विशेषताओं का अध्ययन करेगी।