पाकिस्तान के राष्ट्रपति का विवादास्पद बयान: क्या अल्पसंख्यकों के लिए 'बर्दाश्त' करना सही है?
पाकिस्तान के राष्ट्रपति का बयान विवादों में
नई दिल्ली: पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का स्वतंत्रता दिवस पर दिया गया बयान अब चर्चा का विषय बन गया है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में रहने वाले मुसलमान 3-4 प्रतिशत हिंदुओं को 'बर्दाश्त' करते हैं। इस टिप्पणी ने भारत और पाकिस्तान दोनों में बहस को जन्म दिया है।
जरदारी का बयान क्या था?
14 अगस्त को इस्लामाबाद में 'यादगार-ए-फतह' विजय स्मारक के उद्घाटन के दौरान, जरदारी ने कहा, "हम मुसलमान हैं, वे नहीं हैं। लेकिन हमारी सोच ऐसी है कि हम 3-4 प्रतिशत हिंदू आबादी को बर्दाश्त करते हैं।" यह स्मारक भारत के साथ 2025 में हुए संघर्ष को 'मारका-ए-हक' के रूप में मानता है।
आंकड़ों में विसंगति
जरदारी ने हिंदुओं की जनसंख्या 3-4 प्रतिशत बताई, जबकि पाकिस्तान की 2023 की जनगणना के अनुसार, वहां हिंदुओं की संख्या 52 लाख है, जो कुल जनसंख्या का 2.17 प्रतिशत है। इस प्रकार, राष्ट्रपति का आंकड़ा वास्तविकता से अधिक है।
भारत में प्रतिक्रिया
जरदारी के 'बर्दाश्त' शब्द पर भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। केरल हाईकोर्ट के वकील रोहित मडास्सेरिल और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के शोधकर्ता अमित कृष्णकांत पॉल ने इस बयान की निंदा की। पॉल ने कहा, "पाकिस्तान के राष्ट्रपति 80 साल बाद भी स्वतंत्रता दिवस पर भारत का नाम लेकर विभाजन की राजनीति कर रहे हैं।"
संविधान और वास्तविकता
यह सवाल उठता है कि जब पाकिस्तान का संविधान धार्मिक अल्पसंख्यकों को अधिकार और स्वतंत्रता की गारंटी देता है, तो राष्ट्रपति सार्वजनिक मंच पर 'बर्दाश्त' जैसे शब्द का प्रयोग क्यों कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान में हिंदू और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय कई समस्याओं का सामना कर रहे हैं, जैसे जबरन धर्मांतरण और भेदभाव।
बयान का महत्व
पाकिस्तान खुद को अल्पसंख्यकों के लिए सुरक्षित देश बताता है, लेकिन राष्ट्रपति का 'बर्दाश्त' शब्द कई सवाल खड़े करता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के रिश्ते पहले से ही तनावपूर्ण हैं, जिससे कूटनीतिक बहस को और बढ़ावा मिला है।
