पाकिस्तान-चीन संबंधों में बदलाव: FESCO डील से चीनी कंपनी का हटना क्या दर्शाता है?
पाकिस्तान और चीन की दोस्ती पर सवाल
नई दिल्ली: पाकिस्तान और चीन के बीच की मित्रता हमेशा चर्चा का विषय रही है। आर्थिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से दोनों देश एक-दूसरे के निकट दिखाई देते हैं, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इस संबंध पर सवाल उठाए हैं। पाकिस्तान के बिजली क्षेत्र में निवेश के लिए एक चीनी कंपनी का पीछे हटना, दोनों देशों के बीच बदलते समीकरण का संकेत माना जा रहा है।
FESCO के निजीकरण में चीनी कंपनी की अनुपस्थिति
यह मामला पाकिस्तान की प्रमुख बिजली वितरण कंपनी फैसलाबाद इलेक्ट्रिक सप्लाई कंपनी (FESCO) के निजीकरण से संबंधित है। पाकिस्तान सरकार इस कंपनी में निजी निवेश लाने के प्रयास में है और इसके लिए घरेलू तथा विदेशी कंपनियों से रुचि पत्र (EOI) मांगे गए हैं।
FESCO में 51 से 100 प्रतिशत हिस्सेदारी निजी निवेशकों को देने और प्रबंधन का नियंत्रण सौंपने की योजना बनाई गई है। इस प्रक्रिया में कुल 12 निवेशकों ने रुचि दिखाई, जिनमें तुर्की की तीन कंपनियां, एक चीनी कंपनी और आठ पाकिस्तानी निवेशक शामिल थे।
चीनी कंपनी जियांग्शी इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन ने FESCO में रुचि दिखाई थी, जो चीन के सरकारी PowerChina समूह से जुड़ी है। इसकी भागीदारी को पाकिस्तान के पावर सेक्टर में चीन की मजबूत उपस्थिति के रूप में देखा जा रहा था।
प्री-क्वालिफिकेशन में चीनी कंपनी का बाहर होना
हालांकि, अगस्त के अंत में स्थिति में बदलाव आया। पाकिस्तान की निजीकरण आयोग ने FESCO के लिए 10 कंपनियों को प्री-क्वालिफाई किया, लेकिन चीनी कंपनी इस सूची में शामिल नहीं हो सकी। इसके बाद पाकिस्तान के बिजली वितरण क्षेत्र में चीन की रुचि को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
चीन के पीछे हटने के संभावित कारण
इस घटनाक्रम के पीछे कई संभावित कारण हैं। पाकिस्तान का बिजली क्षेत्र आर्थिक चुनौतियों, बकाया भुगतान और वित्तीय दबावों का सामना कर रहा है। ऐसे माहौल में विदेशी निवेशकों के लिए जोखिम बढ़ जाता है। अब चीनी कंपनियां भी निवेश से पहले आर्थिक व्यवहार्यता और संभावित रिटर्न को अधिक गंभीरता से देख रही हैं।
FESCO की डील से चीनी कंपनी का बाहर होना अकेले में रिश्तों में बदलाव का निर्णायक प्रमाण नहीं है, लेकिन यह दर्शाता है कि पाकिस्तान में चीनी निवेश को लेकर पहले जैसी सहजता नहीं रह गई है।
