Newzfatafatlogo

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन: भारत की कूटनीति की परीक्षा और साझा बयान की चुनौती

ब्रिक्स का आगामी शिखर सम्मेलन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक परीक्षा है। जहां एक ओर अमेरिका और यूरोप के साथ संबंध मजबूत हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुराने सहयोगियों का दबाव भी बना हुआ है। सम्मेलन में साझा बयान की संभावना पर सवाल उठ रहे हैं, और मध्य-पूर्व के मुद्दे ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। क्या भारत संतुलन साध पाएगा? जानें इस महत्वपूर्ण सम्मेलन के बारे में।
 | 

भारत की कूटनीति की परीक्षा


नई दिल्ली: ब्रिक्स का आने वाला शिखर सम्मेलन भारत के लिए केवल एक और अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं है, बल्कि यह विदेश नीति की वास्तविक परीक्षा बनकर उभर रहा है। जहां एक ओर भारत के संबंध वाशिंगटन और यूरोपीय देशों के साथ मजबूत हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पुराने सहयोगियों जैसे मॉस्को, बीजिंग और तेहरान का दबाव भी बना हुआ है। इन दोनों धाराओं के बीच संतुलन बनाना इस बार भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी चुनौती मानी जा रही है। सम्मेलन के दौरान यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सभी मतभेदों के बावजूद कोई साझा घोषणापत्र तैयार किया जा सकता है या नहीं।


साझा बयान की चिंता

साझा बयान की जगह अध्यक्षीय सारांश का डर


पर्दे के पीछे की बातचीत इतनी जटिल हो गई है कि कई राजनयिकों को आशंका है कि सम्मेलन बिना किसी सर्वसम्मत घोषणापत्र के समाप्त हो सकता है, और केवल एक 'चेयर समरी' तक सीमित रह सकता है। इससे पहले ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला था, जब मतभेदों के कारण साझा बयान अटक गया था।


मध्य-पूर्व का जटिल मुद्दा

मध्य-पूर्व का मसला बना सिरदर्द


पश्चिम एशिया से जुड़ा मुद्दा सबसे जटिल है। ईरान की योजना है कि वह अमेरिका और इजरायल की सैन्य गतिविधियों के खिलाफ एक कड़ा प्रस्ताव पेश करे, और यह भी आरोप लगाए कि संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी धरती का उपयोग उसके खिलाफ किया।


समस्या यह है कि रूस और चीन इस मामले में ईरान का समर्थन करते नजर आ रहे हैं, जिससे भारत के लिए तटस्थ रहना और भी कठिन हो गया है। एक छोटी सी चूक भी किसी एक पक्ष को नाराज कर सकती है।


वाशिंगटन को नाराज करने से बचना

वाशिंगटन को नाराज करने से परहेज


नई दिल्ली ने अन्य सदस्य देशों को स्पष्ट संकेत दिया है कि वह ब्रिक्स मंच को अमेरिका विरोधी मुहिम का साधन नहीं बनने देगी। कूटनीतिक माध्यमों से यह संदेश भेजा गया है ताकि अंतिम बयान की भाषा संतुलित रहे। इसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की चेतावनी का भी प्रभाव है, जिसमें उन्होंने डॉलर के विकल्प तलाशने वाले किसी भी कदम पर सख्त प्रतिक्रिया की बात कही थी। भारत और अमेरिका के रिश्ते वर्तमान में नाजुक स्थिति में हैं, इसलिए भारतीय अधिकारी हर शब्द को सोच-समझकर रख रहे हैं।