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भारत और ब्रिक्स देशों का डिजिटल पेमेंट सिस्टम: डॉलर की मोनोपोली को चुनौती

भारत और ब्रिक्स देशों ने एक नया डिजिटल पेमेंट सिस्टम विकसित करने की योजना बनाई है, जो अमेरिकी डॉलर की निर्भरता को समाप्त कर सकता है। रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस पहल के बारे में जानकारी दी है, जिसमें केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी और त्वरित भुगतान प्रणाली को जोड़ने पर चर्चा की जा रही है। वर्तमान में, स्विफ्ट प्रणाली में कई समस्याएं हैं, जैसे उच्च शुल्क और समय की बर्बादी। जानें कैसे यह नया सिस्टम वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकता है और डॉलर की मोनोपोली को चुनौती दे सकता है।
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डॉलर की आवश्यकता पर सवाल

क्या आपने कभी सोचा है कि जब भारत रूस से तेल खरीदता है या ब्राजील चीन को सोयाबीन बेचता है, तो डॉलर की भूमिका क्या होती है? क्यों दो देश अपनी खुद की करेंसी होने के बावजूद अमेरिकी डॉलर पर निर्भर हैं? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दशकों से दुनिया इस डॉलर के वर्चस्व को सहन कर रही है, क्योंकि इसका कोई मजबूत विकल्प नहीं था। लेकिन अब स्थिति बदलने वाली है। मुंबई में एक कार्यक्रम में, रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने वाशिंगटन से लेकर वॉल स्ट्रीट तक हलचल मचा दी है। ब्रिक्स देश अब एक डिजिटल पुल पर काम कर रहे हैं, जो डॉलर और स्विफ्ट की एकाधिकार को समाप्त कर सकता है। बिना डॉलर का उपयोग किए, सीधे अपनी करेंसी में व्यापार और त्वरित भुगतान संभव हो सकता है। 


क्या यह भारत का बड़ा कदम है?

क्या यह ग्लोबल इकॉनमी में भारत का मास स्ट्रोक है? 

संजय मल्होत्रा, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर हैं, ने मुंबई में स्पष्ट किया कि ब्रिक्स देश अपने त्वरित भुगतान प्रणाली और केंद्रीय बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) को एक साथ लाने के लिए गंभीरता से विचार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि विभिन्न विकल्पों पर चर्चा चल रही है, जिसमें केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्राओं और त्वरित भुगतान प्रणालियों के बीच संबंध स्थापित करना शामिल है। हालांकि, यह अभी भी प्रारंभिक चर्चा के स्तर पर है। उन्होंने कहा कि ऐसे सीमा पार लेनदेन, विशेषकर खुदरा लेनदेन में, लागत कम करने और लेनदेन की गति बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं।


वर्तमान प्रणाली की चुनौतियाँ

अभी क्या सिस्टम है

वर्तमान में, अधिकांश वैश्विक व्यापार स्विफ्ट प्रणाली के माध्यम से होता है, जो बैंकों को पैसे ट्रांसफर करने की अनुमति देता है। लेकिन इस प्रणाली में कई समस्याएं हैं। पहली समस्या है उच्च शुल्क, जो क्रॉस-बॉर्डर लेनदेन पर लगते हैं। दूसरी समस्या है समय की बर्बादी, क्योंकि पैसे को पहुंचने में कई घंटे या कभी-कभी दिन लग जाते हैं। तीसरी समस्या है इसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाना। यदि अमेरिका किसी देश से नाराज हो जाए, तो वह उसे स्विफ्ट से बाहर कर सकता है, जिससे उस देश की अर्थव्यवस्था ठप हो सकती है। ब्रिक्स देशों, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं, दुनिया की 40% से अधिक आबादी और वैश्विक जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा नियंत्रित करते हैं।