भारत ने टेक्नोलॉजी में नया मुकाम हासिल किया: स्वदेशी क्रायो कूलर का विकास
भारत ने एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि हासिल की है, जिसमें इंदौर के आरआरसीएटी ने स्वदेशी हीलियम बेस्ड क्रायो कूलर विकसित किया है। यह तकनीक न केवल लागत में कमी लाएगी, बल्कि क्वांटम कंप्यूटर, हेल्थकेयर, और डिफेंस जैसे क्षेत्रों में भी क्रांति लाएगी। जानें इस तकनीक के पीछे की चुनौतियाँ और इसके संभावित लाभ।
| Sep 10, 2026, 13:52 IST
भारत ने टेक्नोलॉजी में एक नई दिशा दी
भारत ने विश्व की कुछ प्रमुख महाशक्तियों के दशकों पुराने टेक्नोलॉजिकल एकाधिकार को समाप्त कर दिया है। जब भी क्रिटिकल और डीप टेक्नोलॉजी की बात आती है, पश्चिमी देशों और अमेरिका का रुख हमेशा से इसे नियंत्रित करने और महंगे दामों पर बेचने का रहा है। लेकिन अब भारत के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा कार्य किया है, जिसकी उम्मीद पश्चिमी देशों ने कभी नहीं की थी। इंदौर में स्थित राजा रमन्ना सेंटर फॉर एडवांस टेक्नोलॉजी (आरआरसीएटी), जो कि डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी के अंतर्गत आता है, के वैज्ञानिकों ने -23 डिग्री सेल्सियस का अत्यधिक डीप फ्रीज तापमान प्राप्त करने वाला स्वदेशी हीलियम बेस्ड गिफर्ड मैकमोहन क्रायो कूलर और इंडीजीनियस हीलियम कंप्रेसर पूरी तरह से विकसित कर लिया है।
क्रायोजेनिक्स का महत्व
क्रायोजेनिक्स एक साधारण विज्ञान नहीं है। 1990 के दशक में भारत ने देखा था कि कैसे क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन की तकनीक पर प्रतिबंध लगाए गए थे। डीप क्रायोजेनिक रिसर्च और क्वांटम लेवल की कूलिंग टेक्नोलॉजी पर केवल कुछ देशों का ही दबदबा था, जैसे अमेरिका, जापान, जर्मनी और फ्रांस। भारत को जब भी अपनी एडवांस रिसर्च न्यूक्लियर लैब या सुपर कंडक्टिंग प्रोजेक्ट के लिए क्रायो कूलर की आवश्यकता होती थी, तो हमें इन देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। एक यूनिट की कीमत 40 से 50 लाख रुपये तक होती थी। आरआरसीएटी के वैज्ञानिकों ने 2010 में हीलियम लिक्विफायर पर काम करना शुरू किया और 16 वर्षों के कठिन प्रयासों के बाद यह तकनीक अब पूरी तरह सफल हो गई है।
लागत में कमी और तकनीकी चुनौतियाँ
इस तकनीक के विकास के बाद इसकी लागत 50% घटकर लगभग 20 लाख रुपये रह जाएगी। अब सवाल यह है कि हीलियम से कूलिंग करना इतना कठिन क्यों माना जाता है। पहले, हीलियम के अणु सामान्य गैसों की तुलना में छोटे और हल्के होते हैं, जिससे उन्हें कंप्रेस करना और लीक से बचाना चुनौतीपूर्ण होता है। दूसरे, हीलियम एक दुर्लभ और महंगी गैस है, जिसे एक बार उपयोग करने के बाद हवा में नहीं छोड़ा जा सकता। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सिस्टम विकसित किया है जिसमें हीलियम बार-बार कंप्रेस होती है और -243 डिग्री सेल्सियस तक ठंडी होकर फिर से रिसर्कुलेट होती है। तीसरे, यह तापमान एब्सोल्यूट जीरो के बेहद करीब है, जहां पदार्थ सुपर कंडक्टिंग अवस्था में चला जाता है।
भारत में क्रांति लाने वाले क्षेत्र
इस स्वदेशी तकनीक के आने से भारत के कई क्षेत्रों में क्रांति आने वाली है। पहला, नेशनल क्वांटम मिशन। क्वांटम कंप्यूटर केवल तब काम करते हैं जब उनका प्रोसेसर लगभग एब्सोल्यूट जीरो पर ठंडा रहता है। इस क्रायो कूलर के बिना भारत अपने क्वांटम कंप्यूटर का सपना पूरा नहीं कर सकता था। दूसरा, हेल्थकेयर और सस्ती एमआरआई जांच। एमआरआई मशीनों के सुपर कंडक्टिंग मैग्नेट को ठंडा करने के लिए भारी मात्रा में लिक्विड हीलियम की आवश्यकता होती है, जिससे एमआरआई स्कैन महंगे होते हैं। स्वदेशी क्रायो कूलर से भविष्य में मेडिकल डायग्नोस्टिक सस्ता हो जाएगा। तीसरा, डिफेंस रडार और स्पेस एक्सप्लोरेशन। डीप स्पेस सेटेलाइट के इंफ्रारेड सेंसर और मिसाइल ट्रैकिंग सिस्टम को इस क्रायोजेनिक कूलर का उपयोग करके एक्सट्रीम हीट से बचाया जाएगा। कुल मिलाकर, आरआरसीएटी इंदौर और इंस्टिट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (आईपीआर) गांधीनगर ने मिलकर हीलियम प्यूरिफिकेशन, हीट एक्सचेंजेस और लिक्विड हीलियम प्रोडक्शन का एक पूरा इकोसिस्टम विकसित कर लिया है।
