यमन में हूती विद्रोहियों और सरकारी बलों के बीच तीव्र संघर्ष
यमन में संघर्ष की स्थिति
यमन के मकबाना जिले के कधा क्षेत्र में हूती विद्रोहियों और सरकारी सेनाओं के बीच गंभीर लड़ाई चल रही है। दोनों पक्षों ने अतिरिक्त सैनिकों को तैनात किया है, जिससे पूरा इलाका युद्ध का मैदान बन गया है। यमनी सरकारी बलों को मजबूत करने के लिए हूती विद्रोहियों के ठिकानों पर हवाई हमले किए जा रहे हैं। इसके साथ ही, हूती विद्रोही मारिब शहर की ओर बढ़ रहे हैं, जहां भारी तोपखाने से गोलाबारी की जा रही है।
युद्ध का मानवीय प्रभाव
यमन में चल रहे इस संघर्ष का सबसे बुरा असर आम लोगों पर पड़ रहा है। इंटरनेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर माइग्रेशन के अनुसार, 2000 से अधिक लोग हिंसा से बचने के लिए अफ्रीका के जिबूती भाग चुके हैं। हाल ही में, हूती विद्रोहियों ने यमन के ऐतिहासिक बंदरगाह शहर मोखा पर कब्जा कर लिया है, जो बाब अल-मंडेब चोकपॉइंट के निकट स्थित है।
हूती विद्रोहियों को नुकसान
यमन की अल-जमहूरिया टीवी के अनुसार, 9 अगस्त से 10 सितंबर के बीच हुई झड़पों में नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज के 500 से अधिक सैनिक मारे गए हैं, जबकि 1500 घायल हुए हैं। दूसरी ओर, हूती विद्रोहियों को भी 1000 से अधिक लड़ाकों का नुकसान उठाना पड़ा है, और हजारों उनके सैनिक घायल हुए हैं।
यमन सरकार की प्रतिक्रिया
मोखा पर हूती विद्रोहियों के कब्जे के बाद यमन की सरकार ने जवाबी कार्रवाई की योजना बनाई है। मध्य मारिब प्रांत के गवर्नर अल-अरादा ने कहा कि सरकारी सैनिक फिर से संगठित हो रहे हैं और वे किसी न किसी रूप में लड़ाई में लौटेंगे। उन्होंने मोखा पोर्ट सिटी के पतन को दुखद बताया।
हूती विद्रोहियों की रणनीति
नेशनल रेजिस्टेंस फोर्सेज के नेता तारिक सालेह ने हूती विद्रोहियों पर जवाबी हमले की कसम खाई है। उनका कहना है कि वे सशस्त्र बलों के साथ मिलकर संघर्ष जारी रखेंगे, जब तक यमन ईरान के प्रॉक्सी से मुक्त नहीं हो जाता।
हूती विद्रोहियों की अगली योजना
हूती विद्रोहियों की नजरें दो प्रमुख शहरों पर
मोखा पर विजय के बाद, हूती विद्रोहियों की नजर यमन की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के दो महत्वपूर्ण शहरों, मारिब और ताइज पर है। मारिब में महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने और सरकार के नियंत्रण में सबसे बड़ा तेल और गैस का क्षेत्र है। यदि हूती विद्रोहियों ने यहां कब्जा कर लिया, तो यमन के अधिकांश ऊर्जा संसाधनों पर उनका नियंत्रण हो जाएगा, जो सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के लिए एक बड़ा झटका होगा।
