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रूस-जापान विवाद: पुतिन की इतुरुप यात्रा ने बढ़ाई टेंशन

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया इतुरुप द्वीप यात्रा ने रूस और जापान के बीच 80 साल पुराने विवाद को फिर से उभारा है। जापान ने इस दौरे का कड़ा विरोध किया है, इसे अपने 'उत्तरी क्षेत्रों' के खिलाफ एक कदम मानते हुए। द्वीप का ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान सुरक्षा चिंताएँ इस विवाद को और जटिल बनाती हैं। जानें इस विवाद का इतिहास और पुतिन की यात्रा का क्षेत्रीय स्थिरता पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
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रूस और जापान के बीच पुराना विवाद फिर उभरा


नई दिल्ली: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हालिया दौरे ने रूस और जापान के बीच 80 साल पुरानी भूमि विवाद को फिर से ताजा कर दिया है। पुतिन ने 13 अगस्त को विवादित इतुरुप द्वीप का दौरा किया, जिस पर जापान ने कड़ा विरोध जताया है, इसे अपने 'उत्तरी क्षेत्रों' के खिलाफ एक कदम मानते हुए। भारत के दो करीबी मित्र, रूस और जापान, अब इस द्वीप को लेकर आमने-सामने हैं।


पुतिन की पहली यात्रा और जापान की प्रतिक्रिया

रूसी सरकारी मीडिया के अनुसार, पुतिन ने पहली बार इतुरुप द्वीप का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने स्थानीय अधिकारियों से बातचीत की, मछली प्रसंस्करण संयंत्र का निरीक्षण किया और वहां के निवासियों से संवाद किया।


जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने तुरंत एक बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि पुतिन का यह दौरा जापान की नीति के खिलाफ है। उन्होंने कहा, "इससे जापानी लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंची है। यह कदम जापान के लिए स्वीकार्य नहीं है।" जापान इस द्वीप को 'एतोरुफु' के नाम से जानता है।


इतुरुप द्वीप का महत्व और विवाद का इतिहास

इतुरुप द्वीप प्रशांत महासागर में कुरील द्वीपसमूह के दक्षिण में स्थित है और यह जापान के होक्काइडो द्वीप के निकट है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों में, 1945 में, सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था। तब से रूस का नियंत्रण बना हुआ है। जापान इन चार द्वीपों - इतुरुप, कुनाशिर, शिकोटान और हाबोमाई पर अपना दावा करता है।


जापान इन्हें 'उत्तरी क्षेत्र' कहता है, जबकि रूस इन्हें दक्षिणी कुरील का हिस्सा मानता है। इसी कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से रूस और जापान के बीच औपचारिक शांति संधि नहीं हो पाई है। 1956 में राजनयिक संबंध बहाल हुए, लेकिन भूमि विवाद आज भी बना हुआ है।


वर्तमान तनाव और सुरक्षा चिंताएँ

पुतिन का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब पूर्वी एशिया में पहले से ही तनाव बढ़ा हुआ है। 12 अगस्त को उत्तर कोरिया ने बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया था। अमेरिका और दक्षिण कोरिया के सैन्य अभ्यास से पहले यह परीक्षण और अब पुतिन का द्वीप दौरा क्षेत्र में रणनीतिक हलचल को बढ़ा रहा है।


रूस के लिए यह संप्रभुता का एक स्पष्ट संदेश है। मॉस्को ने स्पष्ट किया है कि वह इन द्वीपों पर अपना नियंत्रण नहीं छोड़ेगा और इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के अंतरराष्ट्रीय समझौतों से जोड़ता है।


जापान की सुरक्षा चिंताएँ

टोक्यो के लिए यह केवल भूमि का मामला नहीं है। कुरील द्वीप जापान और रूस के सुदूर पूर्व के बीच एक रणनीतिक स्थान पर स्थित हैं। यहां रूस की बढ़ती सैन्य उपस्थिति जापान की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। चीन, रूस और उत्तर कोरिया को खतरा मानने वाले जापान के लिए पुतिन की यात्रा और भी संवेदनशील बन गई है।


अब सभी की नजर इस पर है कि रूस जापान के विरोध पर क्या प्रतिक्रिया देता है। फिलहाल, इतुरुप पर पुतिन के कदम ने दशकों पुराने घाव को फिर से हरा कर दिया है।