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श्रीलंका के सुप्रीम कोर्ट में 22वें संशोधन की संवैधानिक वैधता पर सुनवाई

श्रीलंका का सुप्रीम कोर्ट संविधान में प्रस्तावित 22वें संशोधन की वैधता पर सुनवाई करने जा रहा है, जिसका उद्देश्य न्यायाधीशों की रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाना है। इस संशोधन को लेकर राजनीतिक विवाद उत्पन्न हो गया है, जिसमें आलोचकों का कहना है कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। वहीं, समर्थकों का तर्क है कि यह लंबित मामलों के समाधान के लिए आवश्यक है। सुनवाई में 25 से अधिक याचिकाओं पर विचार किया जाएगा, और सुप्रीम कोर्ट को तीन हफ्तों के भीतर अपना निर्णय देना होगा।
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सुप्रीम कोर्ट में 22वें संशोधन की सुनवाई

श्रीलंका का सर्वोच्च न्यायालय संविधान में प्रस्तावित 22वें संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई करने जा रहा है। इस संशोधन का उद्देश्य निचली और उच्च अदालतों के न्यायाधीशों की रिटायरमेंट की उम्र को बढ़ाना है। इस कदम ने राजनीतिक और कानूनी विवाद को जन्म दिया है। आलोचकों का मानना है कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जबकि समर्थकों का कहना है कि यह लंबित मामलों के समाधान के लिए आवश्यक है। चीफ जस्टिस पी.पी. सुरसेना द्वारा गठित पांच-सदस्यीय बेंच इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी। सोमवार को की गई घोषणा के अनुसार, यह बेंच 25 से अधिक याचिकाओं का निपटारा करेगी, जो इस बिल के खिलाफ और इसके समर्थन में दायर की गई हैं।


22वें संशोधन का उद्देश्य

प्रस्तावित 22वें संशोधन का मुख्य उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की रिटायरमेंट की उम्र को 65 से बढ़ाकर 67 वर्ष और कोर्ट ऑफ अपील के न्यायाधीशों की उम्र को 63 से बढ़ाकर 65 वर्ष करना है। इसके अलावा, हाई कोर्ट, जिला अदालतों और मजिस्ट्रेट अदालतों के न्यायाधीशों की रिटायरमेंट की उम्र को 62 वर्ष करने का भी प्रस्ताव है। कई विपक्षी दलों ने मांग की थी कि इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के 12 मौजूदा न्यायाधीशों की पूरी बेंच द्वारा की जाए। हालांकि, बेंच का गठन करना चीफ जस्टिस के अधिकार क्षेत्र में आता है। 22वें संशोधन बिल को 18 अगस्त को संसद में पेश किया गया, जिससे संविधान के तहत इसकी वैधता को चुनौती देने के लिए 14 दिन की समय-सीमा शुरू हो गई। अब सुप्रीम कोर्ट को तीन हफ्तों के भीतर इस बिल की संवैधानिकता पर अपना निर्णय संसद के स्पीकर को सूचित करना होगा।


विपक्ष का विरोध

विपक्ष के कई नेताओं का कहना है कि याचिकाओं में मुख्य तर्क यह है कि 22वां संशोधन संविधान के अनुच्छेद 3 का उल्लंघन करता है, जो लोगों की संप्रभुता से संबंधित है। उनका तर्क है कि इसे संसद में दो-तिहाई बहुमत के अलावा देशव्यापी जनमत संग्रह के माध्यम से भी मंजूरी की आवश्यकता है। विरोध करने वालों ने इस संशोधन को न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर "सीधा हमला" बताया है। उनका कहना है कि इससे कार्यकारी राष्ट्रपति को अदालतों के कामकाज में हस्तक्षेप करने का अधिक अवसर मिलेगा। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने कहा है कि श्रीलंका बार एसोसिएशन, ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन के सदस्यों और कॉमनवेल्थ लॉयर्स एसोसिएशन की आपत्तियों के बावजूद वह इस संशोधन को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया जारी रखेंगे।